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Monday, July 12, 2010

द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने अपार धीरज और गहन अन्तरात्मिक सम्पृक्ति से जयशंकर प्रसाद की रचनाओं का जो अध्ययन-विवेचन किया, उसमें रचना का आनंद भी मिलता है और आलोचना/समीक्षा का वैचारिक पक्ष भी

द्वारिका प्रसाद सक्सेना स्मृति न्यास की इधर सामने आई सक्रियता के सौजन्य से स्वर्गीय डॉक्टर द्वारिका प्रसाद सक्सेना (18 फरवरी 1922 - 22 जुलाई 2007) की जो दबी-छिपी रचनाएँ सामने आई हैं, उनमें यशस्वी किंतु उपेक्षित कर दिये गये कवि जयशंकर प्रसाद को एक नये नज़रिए से देखने का मौका मिलता है | द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने प्रसाद की रचनाओं के अपने अध्ययन-विवेचन में एक बड़ा काम इस आलोचना-रूढ़ी को तोड़ने का किया है कि प्रसाद आदर्शवादी हैं | उल्लेखनीय है कि आलोचकों व समीक्षकों के लिये जयशंकर प्रसाद एक खासी चुनौती रहे हैं और इस बात पर खासी बहस रही है कि उन्हें एक आदर्शवादी माना जाए या पक्का यथार्थवादी ? प्रसाद को लेकर द्वारिका प्रसाद सक्सेना का जो भी अध्ययन-विवेचन अभी तक सामने आया है, उससे यही आभास होता है कि द्वारिका प्रसाद सक्सेना आलोचकों व समीक्षकों की उस जमात में हैं जो प्रसाद को पक्के यथार्थवादी के रूप में देखता/पहचानता है | इस जमात के लोगों ने माना/बताया है कि प्रसाद निरंतर दृष्टा तथा प्रखर मनोविश्लेषक थे | उनका दर्शन उन्हें वह चीज़ देता है जिसे अंग्रेज़ी में 'विज़्डम' कहते हैं और जो शायद गीतोक्त 'समत्वबुद्वि' या 'स्थितप्रज्ञता' के समीप पड़ती है | यहाँ यह रेखांकित करना प्रासंगिक होगा - और साथ ही द्वारिका प्रसाद सक्सेना की वैचारिक स्पष्टता व प्रखरता को समझने में मददगार भी होगा - कि डॉक्टर रामविलास शर्मा ने 1959 में 'समालोचक' का जो 'यथार्थवाद विशेषांक' सम्पादित किया था उसमें द्वारिका प्रसाद सक्सेना का 'प्रसाद के आदर्शवादी चिंतन में यथार्थवादी दृष्टिकोण' शीर्षक से एक महत्त्वपूर्ण लेख प्रकाशित हुआ था |
द्वारिका प्रसाद सक्सेना प्रसाद साहित्य के गभीर अध्येता थे और उन्होंने प्रसाद साहित्य का विस्तृत अध्ययन-विवेचन किया है | उनका जो काम अभी तक प्रकाशित हो सका है, उसमें 'प्रसाद दर्शन', 'आँसू-भाष्य', 'कामायनी भाष्य', 'प्रसाद का मुक्तक-काव्य', 'कामायनी में काव्य संस्कृति और दर्शन', 'प्रसाद के नाटकों में इतिहास, संस्कृति, धर्म, दर्शन और कला' आदि प्रमुख हैं | द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने प्रसाद का अध्ययन-विवेचन उस समय किया जबकि दूसरे लोग प्रसाद से 'बचने' की कोशिश करते थे | प्रसाद का साहित्य आलोचकों व समीक्षकों के लिए दरअसल इसलिए चुनौतीपूर्ण रहा क्योंकि उनकी कविताएँ गहरे पैठने की माँग करती हैं | प्रसाद पहले पाठ में ही आकर्षित करने वाले कवि नहीं हैं | व्यस्क जिज्ञासाओं से उन्मथित वह ऐसे कवि हैं जो अपनी भावनाओं को जीवन-जगत के प्रति एक दृष्टि अर्जित करने के अनिवार्य संघर्ष में नियोजित करने की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं | प्रसाद की रचनाओं में भाव की दुरूहता है, न कि भाषा की | ऐसे में, जयशंकर प्रसाद की रचनाओं में 'उतरना' कोई हँसी-खेल नहीं रहा; और - शायद - इसीलिए अधिकतर समीक्षकों व आलोचकों ने प्रसाद को बाईपास करने में ही अपनी भलाई समझी | यह जानना, द्वारिका प्रसाद सक्सेना के प्रति सम्मान को और बढ़ाता है कि दूसरे लोग जब प्रसाद से 'बच' रहे थे, तब उन्होंने प्रसाद की रचनाओं से जूझने का काम किया | अपार धीरज और गहन अन्तरात्मिक सम्पृक्ति से उन्होंने प्रसाद की रचनाओं का अध्ययन-विवेचन किया | द्वारिका प्रसाद सक्सेना की आत्मकथा में दिये गये तथ्यों से जोड़ कर इस बात को यदि देखें तो हम पाते हैं कि जिस समय वह जीवन-संघर्षों का सामना कर रहे थे, लगभग उसी समय उन्होंने प्रसाद की रचनाओं से भी 'जूझना' शुरू कर दिया था | यह तथ्य द्वारिका प्रसाद सक्सेना की वैचारिक दृढ़ता और प्रतिबद्वता का ही सुबूत है |
और इस बात का सुबूत भी कि किसी रचना के मूल्यांकन के लिए आवश्यक अवयवों की द्वारिका प्रसाद सक्सेना को न सिर्फ पहचान थी, बल्कि वह उनसे परिपूर्ण भी थे | रचना के मूल्यांकन के लिए मूल्यचेतना जरूरी है और मूल्यचेतना के लिए सामाजिक चेतना | इस प्रकार आलोचनात्मक विवेक के मूल में आलोचक का सामाजिक विवेक होता है जो बहुत दूर तक वर्तमान के बोध से जुड़ा होता है | इसीलिए आलोचना व्यापक अर्थ में विचारधारात्मक क्रियाशीलता मानी जाती है | यह ठीक है कि यदि आलोचक के पास किसी कृति को समझने और उसकी व्याख्या करने की क्षमता नहीं है तो विचारधारा के मंत्र से कृति का द्वार नहीं खुल सकता; लेकिन यह भी सच है कि यदि आलोचक के कलात्मक विवेक के साथ उसका सामाजिक विवेक भी सक्रिय न हो तो वह कृति की सामाजिक सार्थकता की भी पहचान नहीं कर सकता | सार्थक रचना की तरह सार्थक आलोचना भी अपने समय और समाज की हलचलों तथा वैचारिक व संवेदनात्मक परिवर्तनों के बारे में सजग होती है तभी वह रचनाओं से स्वतंत्र और कभी-कभी उनके समानांतर अपनी सामाजिक दृष्टि निर्मित करती है जिससे वह विचारशीलता विकसित होती है जो अपने युग के विवेक का प्रतिनिधित्व करती है | ऐसी आलोचना केवल साहित्यिक ही नहीं होती, वह सामाजिक आलोचना भी होती है | द्वारिका प्रसाद सक्सेना की आलोचनापरक पुस्तकों के साथ उनकी 'मेरी आत्मकथा' पढ़ने पर हम इस तथ्य को और भली प्रकार समझ सकते हैं |
एक अच्छी साहित्यिक रचना की तरह सार्थक आलोचना भी माँग करती है कि लेखक उन सवालों से पूरी सजगता, संवेदनशीलता और संजीदगी के साथ टकराए जो मौजूदा परिस्थितियों में हमारी मानवीय गरिमा को परिभाषित-प्रतिष्ठित करने में अनिवार्य रूप से प्रासंगिक हो गये हैं | मुक्तिबोध जिन्हें ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान कहते हैं उनमें से रचना में पहले की प्रमुखता होती है और आलोचना में दूसरे की | रचना जहाँ हमारी मानवीय गरिमा से जुड़ी समस्याओं और चुनौतियों को एक सघन व प्रखर अनुभव के रूप में व्यक्त करती है वहीं आलोचना में ऐसे अनुभवों का सैद्वांतिक विश्लेषण पेश किया जाता है | रचना का ज्ञानात्मक आधार, वहाँ मौजूद हमारी स्थिति और मानसिकता की पहचान, मुख्यतः प्रज्ञा (intuition) से प्राप्त स्वतःस्फूर्त संज्ञान के रूप में हमारे सामने होता है जबकि आलोचना में इस प्रकार के संज्ञान को भी सैद्वांतिक विश्लेषण में ढाल दिया जाता है | द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने इसे जिस कौशल से साधा है, वह आकर्षित भी करता है और प्रभावित भी | शायद यही कारण हो कि एक पाठक के रूप में मुझे द्वारिका प्रसाद सक्सेना के लिखे हुए में रचना का आनंद भी मिला और आलोचना/समीक्षा का वैचारिक पक्ष भी | द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने जितने विविधतापूर्ण विषयों पर काम किया है, उसकी आधी-अधूरी सूची पर एक उड़ती-सी नज़र भी रेखांकित करती है कि उनके सोच-विचार का दायरा खासा व्यापक और बहुआयामी था | उनके आलोचना कर्म में विषयों की यह व्यापकता और बहुआयामिता इस बात का सुबूत भी है और कारण भी कि वह अपने समय के अनिवार्य रूप से प्रासंगिक बने हुए सवालों से पूरी सजगता, संवेदनशीलता और संजीदगी के साथ जूझ रहे थे | ऐसे में, द्वारिका प्रसाद सक्सेना स्मृति न्यास ने उनके लिखे हुए को सामने लाने का जो प्रयास शुरू किया है, वह - देर से शुरू होने के बावजूद - महत्वपूर्ण तो है ही, साथ ही प्रसांगिक भी है |

Monday, June 14, 2010

कृत्या की वर्कशॉप में विचाराधीन 'व्हाय पोएट्री मैटर्स' सवाल, जितना शास्त्रीय है उतना ही रचनात्मक भी है

'कृत्या' द्वारा 'व्हाय पोएट्री मैटर्स' विषय पर आयोजित की जा रही वर्कशॉप का निमंत्रण मिलते / देखते ही मुझे अभी हाल ही में प्रकाशित हुए कश्मीर की युवा कवयित्री आशमा कौल के तीसरे कविता संग्रह 'बनाए हैं रास्ते' की भूमिका में लिखी पंक्तियाँ याद हो आईं, जिनमें कहा गया है : 'मनुष्यता के भीतर कविता है और कविता के भीतर मनुष्यता |' किसी विद्वान द्वारा कही गई इस बात को याद करते हुए - कि कविता बड़े काम की चीज है; मगर उसका काम क्या है, कहना कठिन है - आशमा कौल ने लिखा है : 'मैं मानती हूँ कि कविता का काम वह है जो किसी और विधि से किसी और विधा में उस तरह संभव नहीं है | किसी फौरी जरूरत, किसी तात्कालिक आवश्यकता के लिये जरूरी नहीं कि कविता ही लिखी जाए | अगर ऐसी किसी जरूरत में कोई कविता लिखता भी है, तो यह सोचकर नहीं कि वह कविता लिख रहा है | ऐसी कोशिशों में भी कुछ अच्छी और कभी-कभार कोई महान कविता भी निकल आती है | लेकिन उतनी कविता ..... कविता की उतनी संभावना तो जीवन की हर कोशिश, कला की हर विधा में होती है |'
कविता को 'एक नये जीवन का सृजन जैसा अनुभव' मानने वालीं कश्मीर में जन्मी आशमा कौल ने कविता के सौंदर्यशास्त्र के एक आयाम को रखांकित करते हुए अपने इसी संग्रह की भूमिका में ही कहा हैं : 'वह पूर्ण तृप्ति की नहीं, अधूरी तृप्ति की कला है ! कि वह प्यास बुझाये भी और एक नई प्यास जगाये भी |'
'कृत्या' ने वर्कशॉप के लिये जो सवाल लिया है, वह कोई नया नहीं है | यह सवाल शायद तभी से नये-नये रूप धर कर सामने आता रहा है जबसे कविता को एक विधा के रूप में पहचाना गया होगा | लेकिन बार-बार चूंकि यह सवाल चर्चा में आता रहा है, इसलिए ऊपर से सरल दिखने वाला यह सवाल अपनी जटिलता का सुबूत भी पेश करता रहा है | मेरे लिये इस बात को रेखांकित करना ही किंचित रोमांचक रहा कि एक तरफ केरल में वर्कशॉप आयोजित करने की तैयारी कर रहीं रति सक्सेना और दूसरी तरफ दिल्ली में अपने तीसरे संग्रह की भूमिका लिख रहीं आशमा कौल कैसे एक ही विषय को अपने-अपने तरीके से निभाने की कोशिश कर रहीं हैं | जाहिर है कि यह सवाल जितना पुराना है उतना ही नया भी है | रति सक्सेना के वर्कशॉप के विषय और आशमा कौल के कविता संग्रह की भूमिका के संदर्भ को प्रतीक रूप में लें, तो यह भी कह सकते हैं कि यह सवाल जितना शास्त्रीय है उतना ही रचनात्मक भी है | यहाँ रामधारी सिंह दिनकर की उस चुटकी को याद कर लेना भी प्रासंगिक होगा जिसमें उन्होंने कहा था कि 'जिस तरह आलोचकों ने लंबे समय से कविता पर तर्क-वितर्क किया है, कविता कब न गुम हो जाती, लेकिन गनीमत है कि मन कविता को पहचानता है |' लेकिन चूंकि मन की इस पहचान से काम नहीं चल सकता, इसलिए कविता के स्वरूप पर बार-बार विचार करना जरूरी समझा गया और विचार किया भी गया | बार-बार विचार करने की ज़रूरत इसलिए भी समझी गई, क्योंकि जितने भी आचार्यों, विद्वानों और आलोचकों ने कविता के स्वरूप पर विचार किया है, उनका विचार अधिक से अधिक एक खास युग की कविता तक ही सीमित रहा है और पूरी कविता उनकी पकड़ से प्रायः बाहर ही रही है |
प्लेटो ने कविता को लोकोत्तर अमूर्त दृष्टि से देखा, जबकि उनके शिष्य अरस्तू का नजरिया अनुभववादी तथा मूर्त था | प्लेटो वस्तु के रूप को अमूर्त चेतना में स्थित प्रत्यय का अनुकरण मानते थे और अरस्तु रूप को वस्तु से अभिन्न ही नहीं, वस्तु के कारणों में से भी मानते थे | इसीलिए अनुकरण को प्लेटो जहाँ यथार्थ से दूर और यथार्थ को विकृत करने वाला मानते थे वहीं अरस्तु उसे यथार्थ से बढ़ कर मानते थे | कविता को इसीलिए इतिहास से श्रेष्ठ मानते थे कि यह इतिहास की तरह विशेष तथ्यों तक सीमित न रह कर संभावनाओं को आत्मसात भी करती है | अमेरिकी कथाकार और कवि एडगर एलेन पो ने अपने एक व्याख्यान 'द पोएटिक प्रिंसिपल' में कविता को सौंदर्य की लयात्मक सृष्टि (द रिदमिकल क्रिएशन ऑफ ब्यूटी) कहा और उसके प्रभाव को आत्मा का गहन और शुद्व उन्नयन (इंटेंस एंड प्योर एलिवेशन ऑफ द सोल) के रूप में रेखांकित किया, जिसे सौंदर्य के अनुचिंतन के परिणाम के रूप में भी देखा गया | एडगर उपदेशवाद और उपयोगितावाद के घोर विरोधी थे | उनके अनुसार सौंदर्य के अनुचिंतन से मिलने वाला आनंद शुद्व तीव्र उदात्त और साथ ही तर्कातीत होता है | एडगर ने सुंदर में उदात्त को भी सम्मिलित कर सौंदर्य-सृजन को ही कविता का विषय माना | कविता का लक्ष्य उनके अनुसार स्वयं कविता ही है जो परम भव्य, पवित्र तथा गरिमामयी होती है | अगर उससे वस्तुजगत का सत्य भी प्रकाशित होता हो, एडगर के अनुसार तो वह मात्र प्रासंगिक स्थिति है अनिवार्य नहीं | फ्रांसीसी कवि बॉदलेयर पर एडगर एलेन पो का गहरा असर था | इसी असर के चलते उन्होंने अपनी कविताओं को 'एक नैतिक वक्तव्य' भी कहा | हालाँकि नैतिकता की उनकी अवधारणा - उपदेशात्मक काव्य के समर्थकों और ऑर्नल्ड व तॉल्सतॉय की नीतिवादिता से भिन्न हैं | नैतिकता को वह जीवन से अलग करके नहीं देखते, वह बल्कि जीवन में उसके घुलेमिले होने का समर्थन करते हैं | उनकी दृष्टी में कविता इस अर्थ में नैतिक होती है कि उसमें मानव जीवन की 'असंगतियों के जादू, पतन की चमक और पाप के फूलों' का भी अंतर्भाव होता है |
'व्हाय पोएट्री मैटर्स' को लेकर हिंदी में भी कोई कम माथापच्ची नहीं हुई है | इस संदर्भ में, 'कविता क्या है' शीर्षक से लिखे गये हिंदी के तीन महत्त्वपूर्ण आलोचकों के लेखों में व्यक्त किए गये विचारों को देखा जा सकता है | 'कविता क्या है' शीर्षक से पहला लेख आचार्य रामचंद्र शुक्ल का है जिसमें उन्होंने लिखा है : 'जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है | हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिये मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे कविता कहते हैं |' इसी लेख में उन्होंने कहा है : 'कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ-संबंधों के संकुचित मंडल से ऊपर उठाकर लोक-सामान्य भावभूमि पर ले जाती   है |' आचार्य शुक्ल के इन विचारों को रीति-काव्य के विरोध में रचा गया माना गया और इसकी पृष्ठभूमि में द्विवेदीयुगीन हिंदी कविता को पहचाना गया, जिसने कविता की पूर्व-निर्धारित सीमाएँ तोड़कर उसका लोक तक प्रसार किया था | 'कविता क्या है' शीर्षक से दूसरा लेख डाक्टर नगेंद्र ने लिखा, जिसमें उन्होंने कविता के लिये तीन तत्त्व अनिवार्य बतलाये : रमणीय अनुभूति, उक्ति-वैचित्र्य और छंद | गौर किया जा सकता है कि छायावाद में हृदय की अनुभूति, अभिव्यक्ति की लाक्षणिकता और संगीत-योजना तीनों पर जोर था | डाक्टर नगेंद्र ने रमणीय अनुभूति को रस कहा है और उसे ही साध्य मानते हुए छंद को उसका साधन-भर माना है | उन्होंने लिखा है : 'कविता रस के साहित्य की उस विधा का नाम है जिसका माध्यम छंद है |' इस तरह उनका काव्य-लक्षण भी छायावाद तक ही सीमित है | 'कविता क्या है' शीर्षक तीसरा लेख नामवर सिंह का है | नामवर सिंह ने नई कविता से प्रेरित होकर कविता को परिभाषित करने की कोशिश की | उन्होंने कहा : 'छायावादी काव्य-रचना की प्रक्रिया जहां भीतर से बाहर की ओर है, वहाँ नई कविता की रचना-प्रक्रिया बाहर से भीतर की ओर है | एक में रूप पर भाव का आरोपण है तो दूसरी में रूप का भाव में रूपांतरण है |' उन्होंने यह भी कहा : 'नई कविता में जिस प्रकार रूप भाव ग्रहण करता है, तथ्य सत्य हो जाता है; और अन्ततः अनुभूति निर्वैयक्तिक हो जाती है उससे स्वयं कविता की 'संरचना' में भी गहरा परिवर्तन आ जाता है |' नामवर सिंह के इसी लेख में व्यक्त हुए दो और कथन गौर करने योग्य हैं : 'नई कविता की इस बनावट या संरचना को ध्यान में रखे बिना आज कविता की कोई भी परिभाषा अधूरी रहेगी' तथा 'यदि नई कविता को कविता के रूप में जांचना-परखना है तो काव्यानुभूति की इस बदली हुई बनावट को ध्यान में रखकर ही कविता की परिभाषा करनी पड़ेगी |' नामवर सिंह का यह लेख भी करीब चालीस वर्ष पहले का है | उसके बाद से आज तक कविता में जो परिवर्तन हुए हैं उन्हें देखते हुए यह परिभाषा भी काफी पुरानी पड़ गई लगती है | कविता में निस्संदेह निर्वैयक्तिकता का भी महत्त्व है और उसकी संरचना का भी; लेकिन आज कविता निर्वैयक्तिकता और वैयक्तिकता के विभिन्न अनुपातों में मिश्रण के साथ लिखी जा रही है और उसकी संरचना भी नई कविता में संरचना की जो अवधारणा थी उससे अनेक बार हटी हुई होती है | नई कविता के दौर में भी मुक्तिबोध की कविता की संरचना भिन्न किस्म की थी | ऐसी स्थिति में उक्त लक्षणों से कविता-मात्र को समझने या पहचानने की तो बात बहुत संगत नहीं है | अन्ततः प्रश्न की कठिनता अपनी जगह पर कायम है और ऐसे में 'कृत्या' के वर्कशॉप आयोजन का महत्त्व बढ़ भी जाता है और प्रासंगिक भी हो जाता है |

Thursday, May 13, 2010

प्रकृति-बोध का संदर्भ, अज्ञेय को अपने समकालीन कवियों के बीच एक अलग पहचान देता है

कविता में पर्यावरण संबंधी चिंताओं व सरोकारों की अभिव्यक्ति की 'खोजबीन' के दौरान अज्ञेय की 'नंदा देवी' श्रृंखला की कविताओं पर गौर किया तो एक दिलचस्प तथ्य यह पाया कि उनमें न सिर्फ पर्वतीय-प्रदेश की प्रकृति के कुछ अनुपम व मनोरम दृश्य उकेरे गये हैं बल्कि उन सबको खो देने का डर और पीड़ा भी अभिव्यक्त हुई है | यह तथ्य मुझे दिलचस्प इसलिए लगा क्योंकि यह तथ्य प्रकृति-बोध के संदर्भ में अज्ञेय को अपने समकालीन कवियों से अलग पहचान देता है | अज्ञेय की कविताओं में प्रकृति के मनोरम चित्रों का एक संग्रह भर नहीं दिखता है, बल्कि सौंदर्य और लय के नैसर्गिक संसार के नष्ट होने की पीड़ा भी उनमें व्यक्त होती नज़र आती है | कहीं-कहीं उसे बचा लेने की पीड़ा भरी इच्छा व कोशिश भी दिखती है | और ठीक इसी मुकाम पर अज्ञेय का प्रकृति-काव्य छायावाद से बिल्कुल अलग राह पकड़ता नज़र आता है | उल्लेखनीय है कि छायावादी कवियों को प्रकृति की छांह में एक तरह की आश्वस्ति मिलती थी; सामाजिक बंधनों की जकड़ से घबराये हुए मन को 'द्रुमों की मृदु छाया में' शांति मिलती थी | लेकिन अज्ञेय के लिये प्रकृति छायावादियों की तरह रोमांटिक शरणस्थली ही बन कर सामने नहीं आती, पीड़ित मानवता की तरह पीड़ित प्रकृति की करुण पुकार भी उन्हें सुनाई पड़ती है | वह यदि एक ओर 'बिखरे रेवड़ को / दुलार से टेरती-सी / गड़रिये की बाँसुरी की तान' सुनते हैं, तो दूसरी ओर 'भट्टी से उठे धुएँ' के फंदे में 'सिहरते-लहरते शिशु धान' भी देखते      हैं |
अज्ञेय ने प्रकृति को लेकर बहुत कविताएँ लिखी हैं | इसी आधार पर माना गया है कि छायावाद के अवसान के बाद प्रकृति के प्रति जो नई सौंदर्य-चेतना, एक नया राग-संबंध विकसित होता है - उसकी प्रामाणिक अभिव्यक्ति अज्ञेय की कविता में हुई है | उल्लेखनीय यह जानना भी हुआ कि उनमें अपने कवि-जीवन के आरंभ से अंत तक प्रकृति के प्रति एक खास तरह का लगाव बना रहा और इस लगाव के खरेपन को उनकी कविताएँ बार-बार प्रमाणिक करती रहीं | यूं तो केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन और त्रिलोचन ने भी प्रकृति को लेकर काफी क़विताएँ लिखी हैं; लेकिन इनकी प्रकृति-संबंधी कविताओं से अज्ञेय की प्रकृति-संबंधी कविताओं का मामला इसलिए अलग है क्योंकि अज्ञेय की प्रकृति का स्वरूप शहरी है | उनकी कविताओं में ग्रामीण क्षेत्र की प्रकृति का चित्रण प्रायः नदारत ही मिलेगा | अज्ञेय की कविता में जो फूल, पौधे, पक्षी आदि आये हैं वे आमतौर पर ऐसे हैं जो शहर-जीवन में मिलते-दिखते हैं | उनकी कविताओं में पर्वतीय-प्रदेश व समुद्र आदि का जो चित्रण है, वह भी अपनी अर्थ-व्यंजना में शहरी रुचि का ही द्योतक है | अज्ञेय के भावबोध का स्वरूप ही शहरी नहीं है, बल्कि उनकी भाषा की प्रकृति भी उसी किस्म की है | तत्सम शब्दों की बहुलता को सुसंस्कृत शहरी-रुचि के संदर्भ में ही देखा/पहचाना जा सकता है | हालाँकि, अज्ञेय की कविताओं में कहीं-कहीं लोक-भाषा के शब्दों का सृजनात्मक प्रयोग भी दिख जाता है, लेकिन वह उनकी कविताओं में कोई पहचान नहीं बना सके हैं | यह कमी, लेकिन अज्ञेय की कविताओं की खूबी बन गई है |
अज्ञेय का प्रकृति-बोध छायावादी बोध से ही अलग नहीं है, वह नई कविता के प्रकृति-बोध में भी अपनी प्रखरता को दर्शाता है | अपने निबंध 'कला का जोखिम' में निर्मल वर्मा ने अज्ञेय के प्रकृति-बोध को रेखांकित करते हुए लिखा है : 'वह पहाड़ों को देख कर मुग्ध होते हैं, तो नीचे जंगलों में पेड़ों के कटने का आर्तनाद भी सुनते हैं, बल्कि कहें, यह कटने का बोध उनके प्रकृति के लगाव में 'एंगुइश', एक गहरी दरार पैदा कर जाता है | उनकी कविताएँ अपने प्रतिद्वंद्वी रूपकों के बीच एक तरह से 'क्रॉस रेफरेंस' बन जाती हैं - सचेत अंतर्मुखी आधुनिकता और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच |' अज्ञेय के प्रकृति-बोध को निर्मल वर्मा ने 'आधुनिक बोध की पीड़ा' का नाम दिया है | गौर करने की बात यह है कि पर्यावरण संबंधी चिंताओं व सरोकारों को अज्ञेय जब अपनी कविताओं में अभिव्यक्त कर रहे थे, उस समय हमारे देश में पर्यावरणवादी आंदोलनों अथवा पर्यावरण-संबंधी चिंताओं के स्वर मुखर नहीं हुए थे | 'नंदा देवी' श्रृंखला की कविताओं में व्यक्त विचार आज के पर्यावरणवादी आंदोलनों के नेताओं के विचार से चकित करने वाली समानता रखते हैं | इस संदर्भ में यह बात जैसे एक बार फिर से साबित होती है कि एक सजग कवि युग-चेतना के पद-चाप की आहट दूसरों से पहले सुन लेता है |
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' के जन्मशती वर्ष में इस बात को पहचानना और रेखांकित करना खास तरह का सुख देता है |