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Friday, November 23, 2012

स्वाति पांडेय नलावडे की कविता में ऐसा आत्मीय संवाद है जो कभी भी समाप्त नहीं होता है

स्वाति पांडेय नलावडे के पहले कविता संग्रह 'रेवा पार से' का लोकार्पण दो दिन बाद इंदौर में हो रहा है । इस कार्यक्रम का निमंत्रण देते हुए स्वाति जी ने बताया कि इस कार्यक्रम को लेकर उनके परिवार में और उनके परिचितों में खासा उत्साह है और इस कारण से यह लोकार्पण कार्यक्रम उनके, उनके परिवार के सदस्यों के और उनके परिचितों के बीच एक उत्सव की तरह देखा/मनाया जा रहा है । अपनी कविताओं, अपने पहले कविता संग्रह और उसके लोकार्पण को लेकर खुद स्वाति जी का उत्साह भी एक विलक्षण अनुभव की तरह मैंने देखा/पाया है । उनकी कविताओं के एक सामान्य पाठक के रूप में मैंने पाया है कि जीवन में कविता को इतनी महत्ता देने के कारण ही स्वाति जी की कविता में सांसारिक चीजों और व्यक्तिगत कार्रवाईयों के रोजमर्रा संसार का गहरा प्रभाव है। ऐसी ऐन्द्रियता उनकी कविताओं की लगभग चारित्रिक विशेषता ही है । अपने आसपास के प्रति संवेदनशीलता और जो दीखता या महसूस होता है उसे भाषा में सहेज और दिखा पाना कठिन काम है, हालांकि यह कविता का एक बुनियादी काम है - जिसे स्वाति जी ने विविधता के साथ साधा है । ऐसी कविताओं की इन दिनों भरमार है जो बिम्बों और रूपकों के ढेर के बावजूद हमें कुछ साफ-साफ दिखा नहीं पातीं । ऐसे में स्वाति जी की कविताएं पढ़ना कई मायनों में दृष्टिवती रचनाएं पढ़ना है । भाषा उनके यहां ‘बोलती’ उतना नहीं है जितना ‘देखती’ है और उसके काव्य-प्रभाव में हम भी अपनी देखने की शक्ति को अधिक एकाग्र और सक्रिय कर पाते हैं ।
स्वाति जी समय को पढ़ने की कोशिश करते हुए एक कवि के रूप में उसके स्थूल ब्यौरों में नहीं उलझतीं । वह उसे संक्षिप्त या बहुधा सांकेतिक विवरणों में पकड़ती हैं । उनकी कविताओं में प्रकट और तात्कालिक विवरण प्रायः कम ही मिलेंगे; और समय की अंदरूनी हलचलों को लेकर उनके प्रभावपरक मनोबिम्ब प्रत्यक्ष दिखते हैं । अबोध की संवेदना और अनुभूति से सृजित स्वाति जी की कविताओं में परिपक्व मन की सतर्क भाषा के विपरीत जितनी अनगढ़ता और भोलापन है, उससे कहीं ज्यादा विस्तार और गहराई है । कविताओं के इस विस्तार और गहराई में अबोधपन के अनुरूप अर्थ जितना प्रकट होता है उतना ही अप्रकट रह जाता है । लेकिन किसी भी हालत में स्वाति जी की कविता के अर्थ में प्रकट, अप्रकट रूप किसी भी तरह के रहस्य का जाल नहीं बुनती हैं । आज की कविताओं में बहुतेरी ऐसी हैं जो मनुष्य के और उसके मानवीय संबंधों के संसार तक ही सीमित हैं; लेकिन स्वाति जी की कविता हमारे संसार को अर्थपूर्ण विस्तार देती है और यह प्रीतिकर अहसास कराती है कि हमारे संसार में सिर्फ दूसरे लोग और संबंध भर नहीं हैं बल्कि अन्य चीजें भी हैं; और उनके साथ हमारे रिश्ते हमारी बुनियादी अस्मिता का एक अनिवार्य अंग हैं । एक सच्चे कवि की तरह स्वाति जी की कविताओं में जो धड़कता संसार है वह किसी तरह का अस्तिमूलक आतंक नहीं पैदा करता; बल्कि वह मनुष्य की रोजमर्रा की जिंदगी और उसके गहनतम अनुभवों में शरीक संसार है और कई बार चीजों के साथ रिश्ता उतना ही सहज और आत्मीय है जितना दूसरे लोगों के साथ संभव है; चीजों से अलगाव, उनका बेगानापन और उनका आतंक जब लगभग नई रूढि़यां बन चुके हैं - चीजों के साथ सहज आत्मीयता की संभावना की पहचान जीवित रखकर स्वाति जी की कविता न केवल कविता में एक भिन्न किस्म का स्वाद पैदा करती है बल्कि किन्हीं अर्थों में एक ऐसे महत्वपूर्ण तत्व को हमारी कला में सारी आधुनिकता के बावजूद बरकरार रखती है जो हमारी पारंपरिक कलादृष्टि का मूल्यवान तत्व रहा है और जो हमारा रचनात्मक उत्तराधिकारी है ।
स्वाति पांडेय नलावडे की समाज-व्यवहार-परक कविताओं में जीवन में उपस्थित वस्तुओं, दृश्यों और स्थितियों से ऐसी काव्यात्मक निर्मितियां की गयीं हैं कि उन्होंने असाधारण अर्थ-विस्तार पा लिया है । उनमें न केवल सतह की सच्चाई बल्कि उसकी हर भीतरी पर्त उधड़ कर हमारे सामने आ गई है । स्वाति जी की कविताओं में मनुष्य और मनुष्य के बीच सहभोक्ता का एक अंतरंग रिश्ता कायम करने के साथ आपसी समझ का सहकार-भाव पैदा किया जा सका है । आस्था से भरा यह सहकार-भाव टूटता नहीं है और न पराजित होता है; बल्कि हर विपरीत परिस्थिति, हर द्धन्द्ध से निबटने की गहरी इच्छा जगाता है । स्वाति जी ने अपनी कविताओं में वैचारिकता को निरंतर सक्रिय रखा है; और इस तरह उनकी कविताओं में विचार और संवेदना का पारंपरिक द्धैत व्यर्थ हो जाता है । उनके कुछ आग्रह और सरोकार हैं जो उनकी कविता में साफ-साफ झलकते हैं और जिनकी किसी न किसी तरह की परंपरा उनके संपूर्ण कृतित्व में खोजी भी जा सकती है । लेकिन बुनियादी तौर पर उनकी कविता का आकर्षण इस विचार-समुच्चय या उसकी परंपरा में नहीं है । उनकी कविता के पास हम उसकी तीखी-चमकती समझ के लिए जाते हैं जो निरे विचार से संभव नहीं है और जिसके लिए एक ऐसी संवेदना की जरूरत है जो जीने की तकलीफों से जूझती-उलझती है, और उनसे पल्ला नहीं छुड़ाती बल्कि उन तकलीफों से घिरे रहकर एक तरह का ‘यातनापूर्ण विवेक’ विकसित करती हुई जीने की इच्छा को अटूट रखती है । जिंदगी में हिस्सेदार कविता और कलात्मक दृष्टि से संपन्न कविता दो अलग चीजें हैं, ऐसा हम मानते और दुर्भाग्य से पाते भी रहे हैं । लेकिन स्वाति जी की कविताओं में गहरा सौंदर्यबोध है, सुख और जोखिमभरी संवेदना, भाषा पर असाधारण नियंत्रण और जीने की साधारण हरकतों की अचूक पकड़ है ।
इसी कारण से, स्वाति पांडेय नलावडे की कविताओं से गुजरते हुए हम पाते हैं कि जो कविता जिंदगी की तकलीफ, साहस, संघर्ष, हर्ष और विषाद को सहेज पाती है, वही शिल्प-सौंदर्य भी अर्जित कर पाती है । भाषा के अर्थगर्भी होने की जो धारणा हमारे यहां आमतौर पर प्रचलित रही है उसमें एक से अधिक अर्थ होने को आवश्यक और वांछनीय माना गया है । अनुभव और जिंदगी की जटिलताओं को अगर कविता में चरितार्थ करना है तो जाहिर है कि एकार्थी भाषा से ऐसा करना संभव नहीं है, इसलिए ‘एंबिगुइटी’ को काव्यगुण माना गया । लेकिन स्वाति जी की  कविता भाषा की इस ‘एंबिगुइटी’ का निषेध करती दिखती है । भाषा स्वाति जी की कविताओं में सिर्फ एक माध्यम भर ही नहीं है, बल्कि उससे आगे जाकर अनुभव का हिस्सा होने की जीवंत कोशिश भी है । कवि के रूप में उन्हें जिस तरह से अपनी संवेदना और अपने विवेक पर भरोसा है कुछ उसी तरह से उन्हें भाषा पर भी है । यह भी कहा जा सकता है कि भाषा पर यह भरोसा ही उन्हें अधिक से अधिक सूक्ष्म और स्पष्ट उपयोग के लिए प्रेरित करता है । यह शिल्पवादी होना नहीं है, हालांकि ऐसा नतीजा निकालने का आसान प्रलोभन - इस बारे में जो भ्रम हमारे यहां माहौल में हैं उनके रहते - सहज ही होगा। यह कवि होना है और सारी अमानवीयता के विरूद्ध मानवीय बने रहने की कोशिश करना है : यहां कविता ही बुनियादी और घनीभूत मानवीयता को बचाये रखने का काम करती है । बिना विशेषणों या बिंबों की सहायता से अनुभव के ऐंद्रिक ग्रहण को भाषा में चरितार्थ कर पाना सीधे-सीधे बयान या बखान द्धारा कठिन काम है । स्वाति जी की कविता इस कठिनता को न सिर्फ प्रभावपूर्ण तरीके से साधती है, बल्कि मौजूदा समय में कविता की संभावना को आगे बढ़ाने का काम भी करती है । ऐसा लगता है कि जैसे स्वाति पांडेय नलावडे के लिए कविता ऐसा आत्मीय संवाद है जो कभी भी समाप्त नहीं होता है । शब्द-बहुलता अतिरेक और दुरूहताओं का अतिक्रमण कर वह एक ऐसा शिल्प और मुहावरा अर्जित करती हैं जो मौजूदा समय और उसमें सुख-दुख झेल रहे मनुष्य के बारे में अत्यंत सघन और मार्मिक बखान करने में समर्थ है ।

Monday, July 12, 2010

द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने अपार धीरज और गहन अन्तरात्मिक सम्पृक्ति से जयशंकर प्रसाद की रचनाओं का जो अध्ययन-विवेचन किया, उसमें रचना का आनंद भी मिलता है और आलोचना/समीक्षा का वैचारिक पक्ष भी

द्वारिका प्रसाद सक्सेना स्मृति न्यास की इधर सामने आई सक्रियता के सौजन्य से स्वर्गीय डॉक्टर द्वारिका प्रसाद सक्सेना (18 फरवरी 1922 - 22 जुलाई 2007) की जो दबी-छिपी रचनाएँ सामने आई हैं, उनमें यशस्वी किंतु उपेक्षित कर दिये गये कवि जयशंकर प्रसाद को एक नये नज़रिए से देखने का मौका मिलता है | द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने प्रसाद की रचनाओं के अपने अध्ययन-विवेचन में एक बड़ा काम इस आलोचना-रूढ़ी को तोड़ने का किया है कि प्रसाद आदर्शवादी हैं | उल्लेखनीय है कि आलोचकों व समीक्षकों के लिये जयशंकर प्रसाद एक खासी चुनौती रहे हैं और इस बात पर खासी बहस रही है कि उन्हें एक आदर्शवादी माना जाए या पक्का यथार्थवादी ? प्रसाद को लेकर द्वारिका प्रसाद सक्सेना का जो भी अध्ययन-विवेचन अभी तक सामने आया है, उससे यही आभास होता है कि द्वारिका प्रसाद सक्सेना आलोचकों व समीक्षकों की उस जमात में हैं जो प्रसाद को पक्के यथार्थवादी के रूप में देखता/पहचानता है | इस जमात के लोगों ने माना/बताया है कि प्रसाद निरंतर दृष्टा तथा प्रखर मनोविश्लेषक थे | उनका दर्शन उन्हें वह चीज़ देता है जिसे अंग्रेज़ी में 'विज़्डम' कहते हैं और जो शायद गीतोक्त 'समत्वबुद्वि' या 'स्थितप्रज्ञता' के समीप पड़ती है | यहाँ यह रेखांकित करना प्रासंगिक होगा - और साथ ही द्वारिका प्रसाद सक्सेना की वैचारिक स्पष्टता व प्रखरता को समझने में मददगार भी होगा - कि डॉक्टर रामविलास शर्मा ने 1959 में 'समालोचक' का जो 'यथार्थवाद विशेषांक' सम्पादित किया था उसमें द्वारिका प्रसाद सक्सेना का 'प्रसाद के आदर्शवादी चिंतन में यथार्थवादी दृष्टिकोण' शीर्षक से एक महत्त्वपूर्ण लेख प्रकाशित हुआ था |
द्वारिका प्रसाद सक्सेना प्रसाद साहित्य के गभीर अध्येता थे और उन्होंने प्रसाद साहित्य का विस्तृत अध्ययन-विवेचन किया है | उनका जो काम अभी तक प्रकाशित हो सका है, उसमें 'प्रसाद दर्शन', 'आँसू-भाष्य', 'कामायनी भाष्य', 'प्रसाद का मुक्तक-काव्य', 'कामायनी में काव्य संस्कृति और दर्शन', 'प्रसाद के नाटकों में इतिहास, संस्कृति, धर्म, दर्शन और कला' आदि प्रमुख हैं | द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने प्रसाद का अध्ययन-विवेचन उस समय किया जबकि दूसरे लोग प्रसाद से 'बचने' की कोशिश करते थे | प्रसाद का साहित्य आलोचकों व समीक्षकों के लिए दरअसल इसलिए चुनौतीपूर्ण रहा क्योंकि उनकी कविताएँ गहरे पैठने की माँग करती हैं | प्रसाद पहले पाठ में ही आकर्षित करने वाले कवि नहीं हैं | व्यस्क जिज्ञासाओं से उन्मथित वह ऐसे कवि हैं जो अपनी भावनाओं को जीवन-जगत के प्रति एक दृष्टि अर्जित करने के अनिवार्य संघर्ष में नियोजित करने की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं | प्रसाद की रचनाओं में भाव की दुरूहता है, न कि भाषा की | ऐसे में, जयशंकर प्रसाद की रचनाओं में 'उतरना' कोई हँसी-खेल नहीं रहा; और - शायद - इसीलिए अधिकतर समीक्षकों व आलोचकों ने प्रसाद को बाईपास करने में ही अपनी भलाई समझी | यह जानना, द्वारिका प्रसाद सक्सेना के प्रति सम्मान को और बढ़ाता है कि दूसरे लोग जब प्रसाद से 'बच' रहे थे, तब उन्होंने प्रसाद की रचनाओं से जूझने का काम किया | अपार धीरज और गहन अन्तरात्मिक सम्पृक्ति से उन्होंने प्रसाद की रचनाओं का अध्ययन-विवेचन किया | द्वारिका प्रसाद सक्सेना की आत्मकथा में दिये गये तथ्यों से जोड़ कर इस बात को यदि देखें तो हम पाते हैं कि जिस समय वह जीवन-संघर्षों का सामना कर रहे थे, लगभग उसी समय उन्होंने प्रसाद की रचनाओं से भी 'जूझना' शुरू कर दिया था | यह तथ्य द्वारिका प्रसाद सक्सेना की वैचारिक दृढ़ता और प्रतिबद्वता का ही सुबूत है |
और इस बात का सुबूत भी कि किसी रचना के मूल्यांकन के लिए आवश्यक अवयवों की द्वारिका प्रसाद सक्सेना को न सिर्फ पहचान थी, बल्कि वह उनसे परिपूर्ण भी थे | रचना के मूल्यांकन के लिए मूल्यचेतना जरूरी है और मूल्यचेतना के लिए सामाजिक चेतना | इस प्रकार आलोचनात्मक विवेक के मूल में आलोचक का सामाजिक विवेक होता है जो बहुत दूर तक वर्तमान के बोध से जुड़ा होता है | इसीलिए आलोचना व्यापक अर्थ में विचारधारात्मक क्रियाशीलता मानी जाती है | यह ठीक है कि यदि आलोचक के पास किसी कृति को समझने और उसकी व्याख्या करने की क्षमता नहीं है तो विचारधारा के मंत्र से कृति का द्वार नहीं खुल सकता; लेकिन यह भी सच है कि यदि आलोचक के कलात्मक विवेक के साथ उसका सामाजिक विवेक भी सक्रिय न हो तो वह कृति की सामाजिक सार्थकता की भी पहचान नहीं कर सकता | सार्थक रचना की तरह सार्थक आलोचना भी अपने समय और समाज की हलचलों तथा वैचारिक व संवेदनात्मक परिवर्तनों के बारे में सजग होती है तभी वह रचनाओं से स्वतंत्र और कभी-कभी उनके समानांतर अपनी सामाजिक दृष्टि निर्मित करती है जिससे वह विचारशीलता विकसित होती है जो अपने युग के विवेक का प्रतिनिधित्व करती है | ऐसी आलोचना केवल साहित्यिक ही नहीं होती, वह सामाजिक आलोचना भी होती है | द्वारिका प्रसाद सक्सेना की आलोचनापरक पुस्तकों के साथ उनकी 'मेरी आत्मकथा' पढ़ने पर हम इस तथ्य को और भली प्रकार समझ सकते हैं |
एक अच्छी साहित्यिक रचना की तरह सार्थक आलोचना भी माँग करती है कि लेखक उन सवालों से पूरी सजगता, संवेदनशीलता और संजीदगी के साथ टकराए जो मौजूदा परिस्थितियों में हमारी मानवीय गरिमा को परिभाषित-प्रतिष्ठित करने में अनिवार्य रूप से प्रासंगिक हो गये हैं | मुक्तिबोध जिन्हें ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान कहते हैं उनमें से रचना में पहले की प्रमुखता होती है और आलोचना में दूसरे की | रचना जहाँ हमारी मानवीय गरिमा से जुड़ी समस्याओं और चुनौतियों को एक सघन व प्रखर अनुभव के रूप में व्यक्त करती है वहीं आलोचना में ऐसे अनुभवों का सैद्वांतिक विश्लेषण पेश किया जाता है | रचना का ज्ञानात्मक आधार, वहाँ मौजूद हमारी स्थिति और मानसिकता की पहचान, मुख्यतः प्रज्ञा (intuition) से प्राप्त स्वतःस्फूर्त संज्ञान के रूप में हमारे सामने होता है जबकि आलोचना में इस प्रकार के संज्ञान को भी सैद्वांतिक विश्लेषण में ढाल दिया जाता है | द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने इसे जिस कौशल से साधा है, वह आकर्षित भी करता है और प्रभावित भी | शायद यही कारण हो कि एक पाठक के रूप में मुझे द्वारिका प्रसाद सक्सेना के लिखे हुए में रचना का आनंद भी मिला और आलोचना/समीक्षा का वैचारिक पक्ष भी | द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने जितने विविधतापूर्ण विषयों पर काम किया है, उसकी आधी-अधूरी सूची पर एक उड़ती-सी नज़र भी रेखांकित करती है कि उनके सोच-विचार का दायरा खासा व्यापक और बहुआयामी था | उनके आलोचना कर्म में विषयों की यह व्यापकता और बहुआयामिता इस बात का सुबूत भी है और कारण भी कि वह अपने समय के अनिवार्य रूप से प्रासंगिक बने हुए सवालों से पूरी सजगता, संवेदनशीलता और संजीदगी के साथ जूझ रहे थे | ऐसे में, द्वारिका प्रसाद सक्सेना स्मृति न्यास ने उनके लिखे हुए को सामने लाने का जो प्रयास शुरू किया है, वह - देर से शुरू होने के बावजूद - महत्वपूर्ण तो है ही, साथ ही प्रसांगिक भी है |

Thursday, May 13, 2010

प्रकृति-बोध का संदर्भ, अज्ञेय को अपने समकालीन कवियों के बीच एक अलग पहचान देता है

कविता में पर्यावरण संबंधी चिंताओं व सरोकारों की अभिव्यक्ति की 'खोजबीन' के दौरान अज्ञेय की 'नंदा देवी' श्रृंखला की कविताओं पर गौर किया तो एक दिलचस्प तथ्य यह पाया कि उनमें न सिर्फ पर्वतीय-प्रदेश की प्रकृति के कुछ अनुपम व मनोरम दृश्य उकेरे गये हैं बल्कि उन सबको खो देने का डर और पीड़ा भी अभिव्यक्त हुई है | यह तथ्य मुझे दिलचस्प इसलिए लगा क्योंकि यह तथ्य प्रकृति-बोध के संदर्भ में अज्ञेय को अपने समकालीन कवियों से अलग पहचान देता है | अज्ञेय की कविताओं में प्रकृति के मनोरम चित्रों का एक संग्रह भर नहीं दिखता है, बल्कि सौंदर्य और लय के नैसर्गिक संसार के नष्ट होने की पीड़ा भी उनमें व्यक्त होती नज़र आती है | कहीं-कहीं उसे बचा लेने की पीड़ा भरी इच्छा व कोशिश भी दिखती है | और ठीक इसी मुकाम पर अज्ञेय का प्रकृति-काव्य छायावाद से बिल्कुल अलग राह पकड़ता नज़र आता है | उल्लेखनीय है कि छायावादी कवियों को प्रकृति की छांह में एक तरह की आश्वस्ति मिलती थी; सामाजिक बंधनों की जकड़ से घबराये हुए मन को 'द्रुमों की मृदु छाया में' शांति मिलती थी | लेकिन अज्ञेय के लिये प्रकृति छायावादियों की तरह रोमांटिक शरणस्थली ही बन कर सामने नहीं आती, पीड़ित मानवता की तरह पीड़ित प्रकृति की करुण पुकार भी उन्हें सुनाई पड़ती है | वह यदि एक ओर 'बिखरे रेवड़ को / दुलार से टेरती-सी / गड़रिये की बाँसुरी की तान' सुनते हैं, तो दूसरी ओर 'भट्टी से उठे धुएँ' के फंदे में 'सिहरते-लहरते शिशु धान' भी देखते      हैं |
अज्ञेय ने प्रकृति को लेकर बहुत कविताएँ लिखी हैं | इसी आधार पर माना गया है कि छायावाद के अवसान के बाद प्रकृति के प्रति जो नई सौंदर्य-चेतना, एक नया राग-संबंध विकसित होता है - उसकी प्रामाणिक अभिव्यक्ति अज्ञेय की कविता में हुई है | उल्लेखनीय यह जानना भी हुआ कि उनमें अपने कवि-जीवन के आरंभ से अंत तक प्रकृति के प्रति एक खास तरह का लगाव बना रहा और इस लगाव के खरेपन को उनकी कविताएँ बार-बार प्रमाणिक करती रहीं | यूं तो केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन और त्रिलोचन ने भी प्रकृति को लेकर काफी क़विताएँ लिखी हैं; लेकिन इनकी प्रकृति-संबंधी कविताओं से अज्ञेय की प्रकृति-संबंधी कविताओं का मामला इसलिए अलग है क्योंकि अज्ञेय की प्रकृति का स्वरूप शहरी है | उनकी कविताओं में ग्रामीण क्षेत्र की प्रकृति का चित्रण प्रायः नदारत ही मिलेगा | अज्ञेय की कविता में जो फूल, पौधे, पक्षी आदि आये हैं वे आमतौर पर ऐसे हैं जो शहर-जीवन में मिलते-दिखते हैं | उनकी कविताओं में पर्वतीय-प्रदेश व समुद्र आदि का जो चित्रण है, वह भी अपनी अर्थ-व्यंजना में शहरी रुचि का ही द्योतक है | अज्ञेय के भावबोध का स्वरूप ही शहरी नहीं है, बल्कि उनकी भाषा की प्रकृति भी उसी किस्म की है | तत्सम शब्दों की बहुलता को सुसंस्कृत शहरी-रुचि के संदर्भ में ही देखा/पहचाना जा सकता है | हालाँकि, अज्ञेय की कविताओं में कहीं-कहीं लोक-भाषा के शब्दों का सृजनात्मक प्रयोग भी दिख जाता है, लेकिन वह उनकी कविताओं में कोई पहचान नहीं बना सके हैं | यह कमी, लेकिन अज्ञेय की कविताओं की खूबी बन गई है |
अज्ञेय का प्रकृति-बोध छायावादी बोध से ही अलग नहीं है, वह नई कविता के प्रकृति-बोध में भी अपनी प्रखरता को दर्शाता है | अपने निबंध 'कला का जोखिम' में निर्मल वर्मा ने अज्ञेय के प्रकृति-बोध को रेखांकित करते हुए लिखा है : 'वह पहाड़ों को देख कर मुग्ध होते हैं, तो नीचे जंगलों में पेड़ों के कटने का आर्तनाद भी सुनते हैं, बल्कि कहें, यह कटने का बोध उनके प्रकृति के लगाव में 'एंगुइश', एक गहरी दरार पैदा कर जाता है | उनकी कविताएँ अपने प्रतिद्वंद्वी रूपकों के बीच एक तरह से 'क्रॉस रेफरेंस' बन जाती हैं - सचेत अंतर्मुखी आधुनिकता और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच |' अज्ञेय के प्रकृति-बोध को निर्मल वर्मा ने 'आधुनिक बोध की पीड़ा' का नाम दिया है | गौर करने की बात यह है कि पर्यावरण संबंधी चिंताओं व सरोकारों को अज्ञेय जब अपनी कविताओं में अभिव्यक्त कर रहे थे, उस समय हमारे देश में पर्यावरणवादी आंदोलनों अथवा पर्यावरण-संबंधी चिंताओं के स्वर मुखर नहीं हुए थे | 'नंदा देवी' श्रृंखला की कविताओं में व्यक्त विचार आज के पर्यावरणवादी आंदोलनों के नेताओं के विचार से चकित करने वाली समानता रखते हैं | इस संदर्भ में यह बात जैसे एक बार फिर से साबित होती है कि एक सजग कवि युग-चेतना के पद-चाप की आहट दूसरों से पहले सुन लेता है |
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' के जन्मशती वर्ष में इस बात को पहचानना और रेखांकित करना खास तरह का सुख देता है |